भारत का सर्वोच्च न्यायालय न्यायिक प्रक्रिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते उपयोग को लेकर सतर्क नजर आ रहा है। इसी क्रम में अदालत ने नए मसौदा नियम जारी करते हुए स्पष्ट किया है कि AI किसी भी स्थिति में न्यायिक निर्णय लेने, दोष तय करने, गवाहों की विश्वसनीयता परखने या जमानत पात्रता का निर्धारण करने का अधिकार नहीं रखेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि AI तकनीक न्यायपालिका की सहायता कर सकती है, लेकिन न्यायिक निर्णय पूरी तरह मानव विवेक और संवैधानिक मूल्यों पर आधारित होने चाहिए। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि न्याय केवल कानूनी तथ्यों का विश्लेषण नहीं है, बल्कि इसमें मानवीय संवेदनाएं, सामाजिक परिस्थितियां और नैतिक पहलू भी शामिल होते हैं, जिन्हें AI पूरी तरह समझने में सक्षम नहीं है।
प्रस्तावित नियमों के अनुसार AI का उपयोग अदालतों में शोध, दस्तावेजी सहायता, अनुवाद, डेटा प्रबंधन और अन्य प्रशासनिक कार्यों में किया जा सकेगा। साथ ही AI आधारित उपकरणों के उपयोग की निगरानी के लिए एक विशेष तंत्र स्थापित करने का भी सुझाव दिया गया है।
यह कदम ऐसे समय में आया है जब दुनिया भर की न्यायिक प्रणालियां AI के उपयोग और उससे जुड़े जोखिमों पर गंभीरता से विचार कर रही हैं। भारत का यह मॉडल अन्य देशों के लिए भी एक मार्गदर्शक सिद्ध हो सकता है।


