अकाल से रसोई तक का सफर: साबूदाना खिचड़ी के पीछे छिपी है भूख से लड़ने की कहानी, जानिए कैसे लोकप्रिय हुई टैपिओका की फसल

NITC Desk
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नवरात्रि के नौ दिनों में साबूदाना कई लोगों के फलाहार का अहम हिस्सा होता है। कोई इसकी खिचड़ी बनाता है, तो कोई वड़ा या खीर। लेकिन इस सफेद दाने की कहानी समझने के लिए हमें केरल के इतिहास और टैपिओका की खेती तक जाना होगा।

19वीं सदी के आखिरी दशकों में त्रावणकोर रियासत में खाद्य संकट ने वैकल्पिक फसलों की जरूरत बढ़ा दी थी। चावल की उपलब्धता प्रभावित होने पर टैपिओका, जिसे कसावा भी कहा जाता है, एक उपयोगी विकल्प के रूप में सामने आया। यह दक्षिण अमेरिका मूल की फसल है, जो उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में उगाई जा सकती है।

केरल में टैपिओका की खेती को बढ़ावा देने का श्रेय तत्कालीन शासकों, खासकर विशाखम तिरुनाल राम वर्मा, को दिया जाता है। महाराजा ने इस फसल की संभावनाओं को पहचाना और इसे आम लोगों तक पहुंचाने के प्रयास किए। शुरुआत में लोगों के मन में इसे खाने की सुरक्षा को लेकर आशंकाएं थीं। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, महाराजा ने स्वयं टैपिओका खाकर लोगों को भरोसा दिलाने की कोशिश की।

टैपिओका को सही तरीके से तैयार करना जरूरी होता है, क्योंकि कसावा की कुछ किस्मों में ऐसे प्राकृतिक यौगिक होते हैं जो अनुचित प्रसंस्करण पर हानिकारक हो सकते हैं। इसलिए इसे सुरक्षित तरीके से छीलना और पकाना महत्वपूर्ण है।

इसके बाद टैपिओका के इस्तेमाल ने केरल में जगह बनाई। द्वितीय विश्व युद्ध के समय चावल की आपूर्ति में आई बाधाओं ने भी इसे भोजन के विकल्प के रूप में लोकप्रिय बनाने में भूमिका निभाई।

लेकिन आज जिस साबूदाने को व्रत में खाया जाता है, वह टैपिओका की जड़ से सीधे निकला हुआ टुकड़ा नहीं होता। इसे बनाने के लिए जड़ से स्टार्च निकाला जाता है और फिर उस स्टार्च को छोटे-छोटे दानों का रूप दिया जाता है।

भारत में टैपिओका स्टार्च से साबूदाना बनाने का उद्योग 1940 के दशक में तमिलनाडु के सेलम क्षेत्र में विकसित हुआ। धीरे-धीरे यह उत्पाद अलग-अलग राज्यों में पहुंचा और व्रत के भोजन में लोकप्रिय हो गया।

इस तरह साबूदाने की कहानी हमें बताती है कि भोजन की कई परंपराएं समय के साथ बदलती जरूरतों, स्थानीय कृषि और खाद्य उपलब्धता से आकार लेती हैं।

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